टीम साथी

इस बार दिवाली मनाने का बिल्कुल मन नहीं है। हमने अभी नया घर बनाया था। मां गांव से चीजें लेकर आई थी। बोली थी कि इस बार दिवाली पर सजाएंगे। मां दिल्ली पहुंची और खबर मिली कि घर टूटने वाला है और घर टूट गया। हमारे घर की ईंट ईंट  बिखर गई। रात को आसपास के दबंग लोग आते हैं, ईंटे उठाकर ले गए। पापा बोले अभी तो ईंट के लिए क्या लड़ना।

अनिकेत  ने अभी 12वीं पास की है। वह संस्कृत में बीए करना चाहता है। छोटी मोटी पंडिताई का भी काम करता है। मगर वह एक सच्चे और ईमानदार पूजा पाठ कराने वाला पंडित बनना चाहता है। कहता है हम दुख को शब्द में नही कह पा रहे।

ख़ोरी गांव से उजड़े अनिकेत जैसे सैकड़ों बच्चे आपको मिलेंगे। ढेर सारी औरतें, ढेर सारे आदमी, आप को यही दुख बयान करते मिलेंगे। कोई पूछते कि आखिर सरकार को हमसे क्या दुश्मनी थी? हमको क्यों नहीं बताया कि जंगल की जमीन है?  यहां मकान मत बनाओ। जैसे किसी भी बस्ती में होता है। मजदूरों की रिहाइश वाली बस्ती में होता है। वैसा यंहा भी समस्याओं के ढेर थे मगर घर था।

पिंकी कहती है हमको बस यही बसा दो। चाहे बहुत छोटी सी जमीन दे दो। हम 12 साल से यंहा है। यंहा हमारी रूह बसी है। यहां सब कुछ खुदा हुआ है और हमारी रूह अंदर दबी हुई है हम कैसे छोड़कर जाएं? पिंकी ख़ोरी गांव के इलाके में रहती थी।

अभिषेक भी एक छात्र है उसका अपना और उसके दो चाचाओं के कुल जमा 3 मकान टूट गए। अभिषेक दिल्ली के हिस्से में एक बचे हुए आखिरी मकान में रहता है। वह भी अभी छात्र है। नेहरू युवाकेंद्र से जुड़ा हुआ है। सुबह मोटरसाइकिल से दुकानों पर दूध देने का काम करता है।  उसके बाद निजामुद्दीन पढ़ने के लिए जाता है। कहता है हम बिहार से 12 साल पहले जैसे आये  फिर उसी हालात में पहुँच गए हैं। जब आए थे तो यहां पानी की बहुत दिक्कत थी। दिल्ली वाले पानी नहीं देते थे। हम दिन में पाइपलाइन डालते थे वो रात तोड़ देते थे। जब यंहा सड़क बनी तो हमने 3 दिन लगातार पहले उसको बराबर किया। दिल्ली के सहीराम पहलवान विधायक थे उनके फंड से डामर तो पड़ रहा था। नीचे का सारा काम हमने किया। हम रातों को जागते थे कि कोई कच्ची सड़क को खराब न कर दे। अब सब कुछ खत्म हो गया। कभी मैं रात को चला जाता हूं ईंटो पर सो जाता हूं। बहुत अपनापन लगता है।

ख़ोरी गांव के हर धार्मिक स्थल को अपना बताने वाले

धर्मेंद्र के पिता बढ़ई है। अपनी मां और छोटी बहनों के साथ धर्मेंद्र तोड़े गए मकान पर त्रिपाल टांग कर सो लेता है। उसे आर्थिक के साथ एक छोटी सभ्यता-सांस्कृतिक के तोड़े जाने का दुख है। उसने भी अभी 12वीं पास की है।

रेखा पिछले 16 वर्षों से ख़ोरी गांव में रहती है सामाजिक काम में भी जुड़ी रहती है। ईमानदारी से ख़ोरी गांव के लोगों के लिए काम करती रही है। छोटी सी घरेलू सामान की दुकान थी। वह भी खत्म हुई। पति सिलाई कढ़ाई का अनियमितकालीन काम करते हैं। बहती आंखों से खोरी से अपना जुड़ाव बताती है। लोगों को ढाढस देती है। मगर अपनी आंख के आंसू कहां रखें? कहती है हमने जीवन भर का सब कुछ तो यंहा लगा दिया। अब कहां जाएं?

रेखा का बेटा अमन भी मां के साथ उसके सामाजिक काम में है। छोटी-मोटी नौकरी ढूंढता है। युवामन की चपलता के वो जिंदादिल है। अब तक के जीवन में बनाये घर के टूटने से टूटा नही है।

अधेड़ उम्र की बीनाज्ञान एक प्राइवेट नर्स है। छोटा सा मकान बनाया था। सोचा था कि जीवन भर काम किया थोड़ा आराम करूंगी। मकान टूटा अब आराम कहां? काम करेंगे। किराए के मकान में किसी तरह गुजर बसर करेंगे। खुद के शरीर में चलने में भी दिक्कत है। मगर जिंदगी तो जीनी ही हैं।

सरोज पासवान फैक्ट्रियों से चुन्नी आदि पर छोटे-छोटे काम करने के लिए इकट्ठा माल उठाते फिर खोरी गांव की बहुत ही महिलाओं को छोटा-छोटा रोजगार मुहैया कराते रहे। लॉकडाउन ने काम छीना। कुछ काम फिर चला तो घर टूटने से सब बिखर गया। अब जो काम करती थी वह महिलाएं भी बहुत दूर हो गई। जो काम 1 दिन में हो जाता था अब हफ़्तों लगते हैं। कर्जा सर पर है। कई जगह पैसा भी अटका है। सब नए सिरे से करना है।

युवक अरशद अली कंप्यूटर में मास्टर है। मकान टूटे तो सरकार से बात करने की हिम्मत की। मगर यह भरोसा हो रहा था कि दिल्ली में मकान है, नहीं टूटेगा। पर मकान टूट गया। दिल्ली सरकार को चिट्ठी भी लिखी कोई जवाब नहीं। मगर हिम्मत नहीं टूटी।

सनुपम यानि सोनू के पिता एक कंपनी में काम करते हैं। उसने ग्रेजुएशन की है आगे की तैयारी है। नौकरी कहीं मिल नहीं रही। मकान टूट गया जो भविष्य में सोचा था। उसकी पूरी नींव खत्म हो गई। घर सपनो से भी बड़ा होता है।

अनिकेत, अमन, अभिषेक, धर्मेंद्र, सोनू व अरशद के साथ 12वीं पास राजा भी खोरी गांव के दुख में जुड़ा है। उनको अपना मानता है। वो उत्तराखंड से है। दिल्ली में अपने दादू के साथ रहता है। उसने कभी ऐसा उजाड़ नहीं देखा। खोरी गांव के मुकदमें के और दूसरे कागजातों को संभालने के साथ कभी खोरी गांव भी जाता है।

यह सारे लोग वह है जो उजाड़ की सब परेशानियों को जूझते हुए भी, खोरी गांव के लोगों के लिए लगातार काम करते हैं। 

रेखा, पिंकी, बीनाज्ञान, सरोज पासवान सर्वोच्च न्यायालय में चल रहे खोरी गांव के उजाड़ की पूरी प्रक्रिया और पुनर्वास नीति पर सवाल उठाने के दोनों मुकदमों में वादी है।

लोगों को हिम्मत देना। लोगों की ओर से चिट्ठियां सरकार को भेजना। सरकार की नीति, सर्वोच्च न्यायालय में जो चलता है, उसकी पूरी खबर रखना व लोगों तक पहुंचाना। लोगों की समस्याओं इकट्ठी करके वकीलों को देना, उनसे मिलना, नगर निगम ने समस्याओं की शिकायत के लिए ईमेल जारी किया तो शिकायती चिट्ठियां भेजी। पुनर्वास के जिस्ट्रेशन के लिए ई पोर्टल जारी कराने के लिए भी चिट्ठियां, पुनर्वास नीति की कमियां और पुनर्वास नीति कैसी हो? इसके लिए भी लगातार चिट्ठियां।  ई पोर्टल सही कराने के लिए चिट्ठियां। तो फिर ई पोर्टल पर लोगों के फार्म भरने के लिए, जब भी, जहां भी समय मिलता, बैठ जाना। सारी छुट्टियां इसी काम में लगती हैं।क

और यह चिट्ठियों कोई एक-दो नहीं होती। सैकड़ों, हजारों लोगों के हस्ताक्षर वाली चिट्ठियां होती हैं। लोगों को पहले बताना और फिर उनके हस्ताक्षर लेना एक लंबा काम होता है। ऐसे सारे कामों में हमारी टीम साथी के साथी लगे रहते हैं।

हम सब का उद्देश्य है सबको अधिकार दिलाना है।

विमल भाई